Neeraj Kumar Victory : बिहार विधान परिषद के पटना स्नातक सीट का चुनाव इस बार सिर्फ एक एमएलसी सीट की लड़ाई नहीं रहा। चुनाव के मैदान में एक तरफ जेडीयू के दिग्गज नेता और मौजूदा एमएलसी नीरज कुमार थे, तो दूसरी तरफ जन सुराज के प्रत्याशी डॉ. अनुज कुमार। लेकिन इस मुकाबले को सबसे ज्यादा चर्चा तब मिली, जब मोकामा विधायक अनंत सिंह खुलकर डॉ. अनुज कुमार के समर्थन में उतर आए।
अनंत सिंह ने चुनाव प्रचार के दौरान नीरज कुमार के खिलाफ जमकर मोर्चा खोला। कई मौकों पर उन्होंने दावा किया कि नीरज कुमार चुनाव हारेंगे और उनके समर्थित प्रत्याशी डॉ. अनुज कुमार जीत दर्ज करेंगे। मोकामा और आसपास के इलाकों में अनंत सिंह के प्रभाव को देखते हुए इस मुकाबले को बेहद दिलचस्प माना जा रहा था।
लेकिन मतगणना का नतीजा सामने आया तो कहानी पूरी तरह पलट गई। नीरज कुमार ने पटना स्नातक सीट पर जीत दर्ज कर ली और डॉ. अनुज कुमार को शिकस्त का सामना करना पड़ा। इसके साथ ही सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो गया—आखिर नीरज कुमार ने ऐसा क्या किया कि अनंत सिंह के खुले विरोध के बावजूद बाजी उनके हाथ लगी?
अनंत सिंह के दावे पर भारी पड़ा नीरज का सियासी अनुभव
चुनाव के दौरान अनंत सिंह जिस आत्मविश्वास के साथ नीरज कुमार की हार का दावा कर रहे थे, उसने मुकाबले को और रोचक बना दिया था। अनंत सिंह ने अपने समर्थित प्रत्याशी के लिए प्रचार किया और लोगों के बीच जाकर वोट की अपील की।यही वजह थी कि पटना स्नातक सीट का चुनाव सिर्फ दो उम्मीदवारों के बीच मुकाबला नहीं रह गया था। इसमें एक तरफ जेडीयू संगठन और नीरज कुमार का लंबा राजनीतिक अनुभव था, तो दूसरी तरफ अनंत सिंह की व्यक्तिगत राजनीतिक पकड़ और जन सुराज का अभियान। नतीजा आया तो नीरज कुमार ने एक बार फिर साबित कर दिया कि चुनावी राजनीति में अंतिम फैसला दावों से नहीं, बल्कि मतदाताओं के वोट से होता है।
आखिरी समय में नीतीश कुमार की मुलाकात भी बनी चर्चा
नीरज कुमार की जीत की कहानी में एक अहम मोड़ चुनाव से ठीक पहले भी देखने को मिला। अंतिम समय में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नीरज कुमार से मुलाकात की थी। इस मुलाकात को राजनीतिक तौर पर काफी महत्वपूर्ण माना गया।नीरज कुमार लंबे समय से जेडीयू के मुखर नेताओं में शामिल रहे हैं। ऐसे में चुनाव के अंतिम दौर में नीतीश कुमार का उनके साथ खड़ा होना पार्टी के भीतर समर्थन और भरोसे का संदेश माना गया।चुनाव के बीच नीरज कुमार की तबीयत भी खराब हुई और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। इसको लेकर भी अनंत सिंह ने बयान दिया था और नीरज कुमार पर तंज कसा था। लेकिन बीमारी और तमाम राजनीतिक हमलों के बीच नीरज ने चुनावी मैदान नहीं छोड़ा।अंततः परिणाम उनके पक्ष में आया।
कौन हैं नीरज कुमार, जिनके खिलाफ खड़ा हुआ पूरा विवाद?
नीरज कुमार की राजनीतिक कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। जिस सीट पर वह आज लगातार चौथी बार जीत दर्ज कर चुके हैं, उसी तरह के चुनाव में उन्हें कभी करारी हार का सामना करना पड़ा था। नीरज कुमार ने पहली बार 2002 में बिहार विधान परिषद का चुनाव लड़ा था। उस समय बिहार की राजनीति में समता पार्टी का दौर था। बताया जाता है कि सूरजभान सिंह के प्रयास से नीतीश कुमार से कहकर नीरज कुमार को टिकट दिलाया गया था। 2002 में नीरज कुमार समता पार्टी के उम्मीदवार बने। उनके सामने आरजेडी के उम्मीदवार आजाद गांधी थे। लेकिन इस चुनाव में नीरज कुमार को हार का सामना करना पड़ा।यहीं से शुरू हुआ नीरज कुमार का लंबा राजनीतिक सफर।
सूरजभान से अनंत सिंह तक बदला राजनीतिक समीकरण
राजनीति में रिश्ते स्थायी नहीं होते और नीरज कुमार की कहानी इसका उदाहरण है। शुरुआती दौर में सूरजभान सिंह के साथ रहने वाले नीरज कुमार बाद के वर्षों में अनंत सिंह के करीबी माने जाने लगे।साल 2008 में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। उस समय नीरज कुमार को अनंत सिंह का मजबूत समर्थन मिला। बताया जाता है कि अनंत सिंह ने जेडीयू नेतृत्व के सामने नीरज कुमार को उम्मीदवार बनाए जाने की जोरदार पैरवी की।आखिरकार जेडीयू ने नीरज कुमार को अपना उम्मीदवार बनाया और 2008 में उन्होंने पहली बार बिहार विधान परिषद का चुनाव जीत लिया।यही जीत उनके राजनीतिक सफर का बड़ा मोड़ साबित हुई।
2008 से 2026 तक जीत का सिलसिला
2008 की जीत के बाद नीरज कुमार ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2014 में उन्होंने दोबारा विधान परिषद का चुनाव जीता। इसके बाद 2020 में भी जेडीयू के टिकट पर जीत दर्ज की।यानी 2008, 2014 और 2020—तीन चुनावों में लगातार जीत हासिल करने के बाद नीरज कुमार ने अब 2026 में चौथी बार पटना स्नातक सीट पर जीत दर्ज कर ली है।यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि इस बार मुकाबला केवल चुनावी उम्मीदवार से नहीं था। चुनाव के दौरान उनके सामने पार्टी के भीतर से उठे सवाल, अनंत सिंह का विरोध और जन सुराज का आक्रामक अभियान भी था। फिर भी नीरज ने अपनी सीट बचा ली।
कभी अनंत के करीबी, अब उन्हीं के निशाने पर
नीरज कुमार और अनंत सिंह की राजनीतिक कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट यही है। एक दौर था जब अनंत सिंह ने नीरज कुमार के लिए जेडीयू नेतृत्व के सामने जोर लगाया था। उसी समर्थन के बाद नीरज कुमार पहली बार विधान परिषद पहुंचे।लेकिन वक्त बदला और दोनों नेताओं के राजनीतिक रास्ते अलग हो गए।नीरज कुमार के खिलाफ खड़े होने के कारण ही अनंत सिंह पर जेडीयू ने कार्रवाई की और उन्हें पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित किया गया। उनकी पत्नी नीलम देवी पर भी पार्टी की कार्रवाई की चर्चा सामने आई।ऐसे में 2026 का पटना स्नातक चुनाव पुराने रिश्तों और नए राजनीतिक समीकरणों की परीक्षा भी बन गया था।
नीरज ने बचाया जेडीयू का किला
पटना स्नातक सीट पर नीरज कुमार की जीत को जेडीयू के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह सीट उनके राजनीतिक प्रभाव का मजबूत आधार रही है।नीरज कुमार सिर्फ चुनाव लड़ने वाले नेता नहीं हैं। वह जेडीयू की राजनीतिक लाइन को मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर मजबूती से रखने वाले नेताओं में गिने जाते हैं। पार्टी के पक्ष में उनका आक्रामक अंदाज और सरकार की नीतियों को लेकर उनका लगातार पक्ष रखना उनकी पहचान बन चुका है।
ऐसे समय में जब अनंत सिंह जैसे प्रभावशाली नेता उनके खिलाफ खुलकर मैदान में थे, नीरज की जीत ने जेडीयू के लिए भी राहत का संदेश दिया है।सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस नेता की पहली चुनावी जीत के पीछे कभी अनंत सिंह का समर्थन था, उसी नीरज कुमार को हराने के लिए इस बार अनंत सिंह ने पूरी ताकत लगा दी।लेकिन चुनावी नतीजे ने एक बार फिर बता दिया कि राजनीति में पुराने रिश्ते, दावे और समीकरण अपनी जगह हैं, लेकिन आखिरी फैसला मतदाता ही करता है।
नीरज कुमार के लिए यह सिर्फ चौथी जीत नहीं है। यह उस राजनीतिक सफर की नई कहानी है, जो 2002 की हार से शुरू होकर 2008 की पहली जीत, लगातार तीन कार्यकाल और अब 2026 की चौथी जीत तक पहुंचा है। और अनंत सिंह के लिए? शायद इस चुनाव का सबसे बड़ा सबक यही है कि जिस मुकाबले में जीत का दावा सबसे ज्यादा भरोसे से किया जाए, वहां नतीजा आने तक राजनीति में कुछ भी तय नहीं होता।












