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Home खास खबर

उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के 4 में 3 विधायक अलग राह पर, बढ़ा सियासी संकट

upendra kushwaha ki party ke 4 mein 3 vidhayak alag raah par, badha siyasi sankat

News Bayaar by News Bayaar
October 7, 2026
in खास खबर, बिहार, राजनीति
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Political crisis escalates as 3 out of 4 MLAs from Upendra Kushwaha's party go separate ways

Political crisis escalates as 3 out of 4 MLAs from Upendra Kushwaha's party go separate ways

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बिहार की राजनीति में इन दिनों एक अजीब सियासी पहेली सामने आई है। एक तरफ राष्ट्रीय लोक मोर्चा यानी RLM का नेतृत्व एनडीए के आधिकारिक उम्मीदवार के साथ खड़ा है, दूसरी तरफ पार्टी के चार में से तीन विधायक उसी चुनाव में अलग उम्मीदवार के समर्थन में उतर गए हैं। तीनों विधायक न सिर्फ अलग राह पर दिखाई दे रहे हैं, बल्कि एक साथ खड़े होकर अपना राजनीतिक फैसला भी सामने रख चुके हैं। इसके बावजूद सवाल उठ रहा है कि आखिर इसे पार्टी में टूट क्यों न माना जाए?

सियासत में किसी पार्टी की ताकत सिर्फ उसके झंडे और नाम से नहीं होती। विधायक उस पार्टी का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक चेहरा होते हैं। ऐसे में जब चार में से तीन विधायक नेतृत्व के फैसले से अलग जाकर किसी दूसरे उम्मीदवार के समर्थन में खड़े हों, तो यह महज असहमति है या पार्टी के भीतर खुला विभाजन—यही सवाल अब RLM के सामने खड़ा है।

मामला बिहार विधान परिषद चुनाव की सारण शिक्षक सीट का है। एनडीए ने इस सीट पर जदयू के उम्मीदवार को मैदान में उतारा है। दूसरी ओर RLM से जुड़े एक वरिष्ठ नेता ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर नामांकन कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि उनके नामांकन के दौरान RLM के तीन विधायक साथ खड़े नजर आए। तीनों ने उनके समर्थन का खुला ऐलान किया।यानी तस्वीर बिल्कुल साफ है—पार्टी नेतृत्व की पसंद एक तरफ और पार्टी के चार में से तीन विधायकों की पसंद दूसरी तरफ।

अगर किसी पार्टी के चार विधायक हैं और उनमें से तीन विधायक नेतृत्व के फैसले के खिलाफ जाकर किसी दूसरे उम्मीदवार के साथ खड़े हो जाएं, तो राजनीतिक तौर पर इसे क्या कहा जाएगा? इसे मतभेद कहा जाए, असहमति कहा जाए या फिर पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन बदलने का संकेत?

क्योंकि मामला सिर्फ किसी बयान या व्यक्तिगत नाराजगी तक सीमित नहीं है। तीन विधायक एक साथ सार्वजनिक रूप से सामने आए हैं। उन्होंने एक ऐसे उम्मीदवार का समर्थन किया है, जो उस सीट पर एनडीए के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव लड़ रहा है। ऐसे में RLM के भीतर नेतृत्व और विधायक दल के बीच दूरी अब पर्दे के पीछे की बात नहीं रह गई है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि तीनों विधायक खुद को RLM से अलग नहीं बता रहे हैं। यानी पार्टी छोड़ने का सवाल नहीं है, लेकिन पार्टी के फैसले से अलग रास्ता जरूर है। यही स्थिति इस पूरे घटनाक्रम को और पेचीदा बनाती है।

दरअसल, राजनीतिक दल में टूट का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि विधायक तुरंत पार्टी का नाम छोड़कर दूसरी पार्टी में चले जाएं। कई बार असली टकराव पार्टी के भीतर ही दिखाई देता है—जब नेतृत्व का फैसला कुछ हो और बहुमत वाले विधायक किसी दूसरे फैसले के साथ खड़े हो जाएं।

RLM में फिलहाल कमोबेश यही तस्वीर नजर आ रही है।

चार में से तीन विधायक एक तरफ हैं। चौथी विधायक नेतृत्व के साथ खड़ी हैं। ऐसे में संख्या का गणित भी अपने आप में बहुत कुछ कह रहा है। पार्टी के विधायक दल में तीन-एक का अंतर किसी सामान्य असहमति की तस्वीर नहीं है। खासकर तब, जब यह अंतर सीधे चुनावी फैसले में दिखाई दे रहा हो।

यही वजह है कि RLM की मौजूदा स्थिति को लेकर ‘टूट’ शब्द पर बहस शुरू हो गई है। एक पक्ष इसे बगावत मान रहा है, तो दूसरा इसे पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक असहमति के रूप में देख रहा है। लेकिन जमीन पर जो तस्वीर दिख रही है, उसमें नेतृत्व की लाइन और तीन विधायकों की लाइन अलग-अलग है।

यह पहली बार भी नहीं है जब RLM के भीतर ऐसा तनाव सामने आया हो। विधानसभा चुनाव के बाद भी पार्टी के तीन विधायक और नेतृत्व अलग-अलग खेमों में दिखाई दिए थे। उस समय भी संगठन और सरकार में भूमिका को लेकर सवाल उठे थे। अब विधान परिषद चुनाव ने पुराने विवाद को फिर सतह पर ला दिया है।

 

फर्क इस बार इतना है कि विवाद सीधे चुनावी मैदान में दिखाई दे रहा है।

एक तरफ गठबंधन का आधिकारिक उम्मीदवार है। दूसरी तरफ RLM से जुड़े नेता को पार्टी के तीन विधायक समर्थन दे रहे हैं। इससे सिर्फ RLM ही नहीं, बल्कि एनडीए के भीतर भी सहयोगी दलों के बीच तालमेल को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

अब उपेंद्र कुशवाहा के सामने असली चुनौती यह नहीं है कि तीन विधायक पार्टी छोड़ेंगे या नहीं। असली चुनौती यह है कि पार्टी के भीतर अंतिम राजनीतिक लाइन किसकी मानी जाएगी?

अगर नेतृत्व एक फैसला करता है और चार में से तीन विधायक उस फैसले से अलग खड़े हो जाते हैं, तो संगठन में नेतृत्व की पकड़ और विधायक दल की भूमिका दोनों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

 

यही RLM की मौजूदा सियासी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू है।

यह लड़ाई फिलहाल पार्टी छोड़ने की नहीं है। यह पार्टी के भीतर रहते हुए नेतृत्व की लाइन से अलग खड़े होने की है। तीन विधायक अलग उम्मीदवार के साथ हैं, लेकिन खुद को पार्टी से अलग नहीं बता रहे। ऐसे में ‘टूट’ शब्द से बचना शायद तकनीकी तौर पर संभव हो, लेकिन नेतृत्व और विधायक दल के बीच खुला मतभेद तो सामने आ ही चुका है।

जब चार में से तीन विधायक नेतृत्व की राह छोड़कर अपनी अलग राजनीतिक राह चुन रहे हैं, तो फिर RLM में टूट आखिर किसे कहेंगे?

आने वाले दिनों में यह सिर्फ एक विधान परिषद सीट का चुनाव नहीं रहेगा। यह तय करेगा कि RLM में फैसले की ताकत किसके पास है—पार्टी नेतृत्व के पास या उस विधायक दल के पास, जिसके तीन सदस्य एक साथ अलग राह पर खड़े हैं।

Tags: Political crisis escalates as 3 out of 4 MLAs from Upendra Kushwaha's party go separate ways
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