बिहार मे जातिगत गणना और आर्थिक सर्वेक्षण का काम अटक गया है। मुख्यमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट कानून के पचड़े में फंसता दिख रहा है। पटना उच्च न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश में जातिगत सर्वे पर तत्काल रोक लग दी है। मुख्य न्यायधीश की बेंच 3 जुलाई को अगली सुनवाई करेगी। लिहाजा,जातियों को गिनने का काम रोक दिया गया है। सरकार ने सभी डीएम को पटना हाई कोर्ट का आदेश की जानकारी दे दी है।
सामान्य प्रशासन विभाग ने जिलाधिकारियों को दिए आदेश में कहा है कि उच्च न्यायालय के निर्णय का अक्षरशः अनुपालन सुनिश्चित किया जाए एवं अपने स्तर से सभी पदाधिकारियों और कर्मियों को आवश्यक निर्देश देने की कृपा की जाए। जाति आधारित गणना का 80% से ज्यादा काम पूरा हो चुका है और 500 करोड़ रुपये भी जारी किए जा चुके हैं।
बिहार में जातिगत गणना और आर्थिक सर्वेक्षण का काम 80% से अधिक पूरा हो चुका है। आफ लाइन का काम तो करीब-करीब पूरा हो चुका है, बाकी है तो आंकड़े को ऑनलाइन करना। विभागीय सूत्रों के मुताबिक सूबे में गणना का काम तेजी से हुआ और 80% से ज्यादा काम पूरा कर लिया गया। पहले चरण में मकानों आदि की गिनती तो 100% तक पूरा कर लिया गया है, लेकिन कोर्ट के निर्देश के बाद दूसरे चरण का काम अंतिम वक्त रोकना पड़ा। दरअसल, इस बार की गणना में खास बात यह थी कि गणना कर्मियों को पहले आफ लाइन डेटा संकलन करना था और इसके बाद उसे आनलाइन करना था। सूत्रों कि माने तो ऑनलाइन कार्य भी तेजी से चल रहा था।
जातिगत गणना के लिए 500 करोड़ रुपए से अधिक की राशि जारी कर दी गई थी। बिहार सरकार ने यह राशि जिला वार जारी की है। जिले की आबादी के मुताबिक राशि आवंटित की गई है। सरकार ने विभिन्न जिलों को दो मद में राशि आवंटित की है। ये राशि ट्रांसपोर्टेशन और आफिस खर्च के मद में जारी की गई। बीस लाख से अधिक आबादी वाले जिलों को तीस-तीस हजार रुपए, बीस लाख से अधिक व चालिस लाख वाले जिलों को ट्रांसपोर्टेशन मद में 50 हजार और ऑफिस खर्च मे 40 हजार रुपए जबकि चालीस लाख से अधिक आबादी वाले जिलों को 60 हजार रुपए वाहन मद पर और 50 हजार रुपए आफिस खर्च पर जारी किए गए हैं।
सरकारी सेवकों को जातिगत गणना और आर्थिक सर्वेक्षण में लगाया गया। हालांकि, इसके लिए अलग से मानदेय तय किया गया। सरकार ने गणना करने वाले को 7500 रुपए एक मुश्त राशि तय की है, जबकि मोबाइल के लिए 2500 रुपए की राशि अलग से भुगतान की गई। पर्यवेक्षक को भी मोबाइल उपयोग के लिए 2500 रुपए और एक मुश्त मानदेय 8000 रुपए तय की गई। मोबाइल के लिए राशि दी जा चुकी है। सहायक को मानदेय के रूप में मात्र 2500 रुपए दी जानी बाकि है। वहीं चार्ज और सहायक चार्ज अधिकारी का मानदेय 25000 हजार रुपए मानदेय तय है। जिलाधिकारी को गणना के लिए 50 हजार रुपए का मानदेय तय किया गया है।
बिहार में जातिगत सर्वेक्षण के लिए कर्मियों को ट्रेनिंग दी गई। ट्रेनिंग पर राशि खर्च की जा चुकी है। ट्रेनिंग के बाद ही यह गणना शुरू की गई। बिहार सरकार के ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट बिपार्ड में मास्टर ट्रेनर को प्रशिक्षण दिया। जिला, प्रखंड स्तर पर प्रशिक्षण लेने वाले कर्मियों के लिए लंच,पानी,चाय आदि पर अधिकतम 150 रुपए प्रति गणक खर्च किए गए हैं। जिला स्तर पर 40 कर्मियों का बैच बनाकर ट्रेनिंग दी गई। हर बैच के लिए अधिक से अधिक 3 हजार रुपए खर्च किए गए हैं।
उच्च न्यायालय के आदेश से जातिगत आंकड़े संग्रह करने वाले का मानदेय फंस गया है। सरकार ने जिला को राशि तो आवंटित कर दी है। लेकिन,कर्मियों को राशि नहीं मिल पाई। मोबाइल खर्च के रूप में आंकड़े जुटाने में लगे शिक्षकों को तो जरुर 2500 रुपए मिले लेकिन, उन्हें दोहरी मार झेलना पड़ सकती है। एक तो छुट्टी के दिन काम किया और दूसरी ओर अब तक गणना का मानदेय भी नहीं मिला और ना ही उनकी छुट्टी की भरपाई हो पाई। अब ये सरकार की ओर टकटकी लगाए हैं।













